Saturday, 2 May 2020

उम्र भर जलता रहा चराग़-ए-आरज़ू अपना..

उम्र भर जलता रहा चराग़-ए-आरज़ू अपना,
लोग कहते रहे बड़ी मुख़तसर दीवाली थी !!

रंग-ओ-बू फाख्ता थे जिस गुलों की महफ़िल में,
उसी महफ़िल में मिरी सांझ ढलने वाली थी !!

इम्तहानों में गुज़ारी थी ज़िन्दगी हमनें,
ज़िन्दगी क्या थी, कोई दस्ता-ए-सवाली थी !!

लुटे पड़े थे आंधियों से दरख़्त औे, मकां,
अब न जाले थे कहीं,और न कहीं जाली थी !!

वो गया करके मुझे, मेरे हवाले " सागर "
वो नज़ाकत वो मुहब्बत सभी ख़याली थी !!

- सागर

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