Friday, 20 February 2015

प्रेम के गीत कुछ...!!

प्रेम के गीत कुछ, शब्द में ढल गये..
प्राण चेतन हुये,तन रतन हो गये, 
रूह इक थाल में,द्वार पर रख गया,
जल उठे सब दिये,जागरन हो गये..

सांझ तक प्रश्न ही प्रश्न थी ज़िन्दगी,
एक उत्तर उगा,सब निरुत्तर हुये,
न विजय शेष थी,न पराजय बची,
सप्तस्वर भी मिटे,रिक्त अक्षर हुये..

तुम उतरते गये,तुम ही तुम रह गये,
तुम ही पूजन हुये,तुम भजन हो गये..

फिर उठा मौन का ज्वार,सागर मथा,
तुम गहन हो गये,तुम गहनतम् हुये,
बज उठा नाद अनहद,प्रभा खिल उठी,
तुम ही प्रेमी हुये,तुम ही प्रियतम हुये..

फिर चले तुम गये,दीप से ज्योति से,
आगमन न रहे, न गमन हो गये....!!

Saturday, 16 November 2013

ग़ज़ल.....!!!

तालीम क्या थी, बस इतनी सी ग़फ़लत आई
मैं बुतपरस्त हुआ , तेरी इबादत आई 

मेरा रदीफ़, मेरा काफ़िया सभी तुम थीं 
मेरी ग़ज़ल से तेरे नाम की शोहरत आई 

उठी दीवार जब भी दो दिलों के आँगन में 
मेरे हिस्से में तिरे प्यार की हसरत आई 

किसे ग़रज़ थी मोहब्बत की आयत पढ़ता 
बात निकली तो बस बीच में दौलत आई 

अजीब बात है एक ही क़िताब को पढ़कर 
तुझे नफ़रत आई औ मुझको मोहब्बत आई 

दौर-ए-इश्क़ में बस ख़ाक हुयी हासिल "सागर" 
न आग का दरिया आया,न डूबने की नौबत आई !!

Tuesday, 23 July 2013

तुम......!!!

तुम
कभी चट्टान का सीना
कभी दो बाँहों की गुड़िया
कभी सवालों की बोझिल सांझ
कभी इतराती गुनगुनी सुबह …. !

तुम
कभी अंतहीन ख़ामोशी
कभी चीखती लहरें
कभी अहिल्या सी निश्चल
कभी नदी सा बदलाव.....!

तुम
कभी सूनी चौखट
कभी चुभती शेहनाई
कभी ढहती दीवारें
कभी नींव की पहली ईंट....!

तुम
कभी शब्द
कभी अर्थ
कभी मैं
कभी तुम
कभी शून्य
कभी रिक्त
तुम …… !!

Saturday, 18 August 2012

एक नया स्रजन

भावनाओं के खेत में बोये थे चंद बीज़             
के एक रोज़ प्रेम की फसल लहलहाएगी ,
मिलन के फूल खिलेंगे ,
स्पर्श की खुश्बू  बिखरेगी, 
एक नया स्रजन होगा !!
पर जीवन की आपाधापी में 
हम सींच ना सके,
प्रेमांकुर तो फूटने से पहले ही 
विलीन हो गए, 
उसी भावनाओं के खेत में 
और स्वतः  उग गए -
कुछ खरपतवार !!
ईर्ष्या,दर्द , नफ़रत 
और सूनापन तो ऐसा उगा 
के काटे नही कटता है...
अब तो शब्दों की आरी भी 
मोथरी हो चली...
एक माली , फूलों के कवि में तब्दील हो गया..
और कविता निरुद्देश्य नियति बन गयी.,.,!!!!!!!!!!!




Saturday, 11 August 2012

क्षमा-याचना


प्रिय साथियों ,
                   पहले तो मैं आप सबका शुक्रगुजार हूँ कि मेरा ब्लॉग इतने दिनों तक विचार शून्य था किन्तु आप सबने मेरे प्रति अपने अगाध स्नेह को बनाये रखा और इससे जुड़े रहे I संभवतः मैं आप सबके इतने स्नेह का पात्र नही था तभी तो मैंने स्वयं को अब तक इससे वंचित रखा I  किन्तु एक बार फिर आपका स्नेहाकान्छी होकर उपस्थित हूँ और याचना करता हूँ कि मेरी इस भूल को तुच्छ   समझकर क्षमा  कर देंगे और अपने ह्रदय में पुनः मुझे स्थान देंगे I दरअसल कुछ बढ़ी हुयी जिम्मेदारियों और दायित्वों के बीच मैं  साहित्य प्रेम से न्याय नही कर पाया,  किन्तु मैं भलीभांति अवगत हूँ कि रचनाकार साहित्य जगत का आजीवन ऋणी होता है , उसे अपने साहित्य धर्म से विलग होने का अधिकार नहीं होता I अतः मैं पुनः अपने इसी धर्म के परिपालन के लिए उपस्थित हूँ , किन्तु यह आप सबके प्रेम और आशीर्वाद के बिना संभव नही होगा I            
                                                                                                                                                                               
                                                                  आपका स्नेहाकांक्षी I                                                                                                       



ग़म -ए-फ़िराक़ में जो मुझको तर-बतर कर दे 
मेरे मौला मुझे वो इश्क़ तू नज़र कर दे  

कोई फ़रेबी शमाँ फिर न मुझे पिघलाए 
मेरे वजूद को तू मोम का पत्थर कर दे   

मेरा गुमनामियों का शौक़ बना रहने दे  
ये शोहरतों का नशा ,मुझपे बेअसर कर दे  

मिली मंज़िल  तो पाया इसमे कोई प्यास नही  
मेरे मौला मुझे तू फिर से इक सफ़र कर दे  

तेरे हक़ूक में तारीकी अता हो  ' सागर '  
किसी ग़रीब की शामों को तू सहर कर दे 


Tuesday, 27 December 2011

नये वर्ष पर कुछ नया गीत हो....!!!


                       नये वर्ष पर कुछ नया गीत हों ..                        

नये वर्ष पर कुछ नया गीत हों 
नये गीत में कुछ नये बोल हो
नयी थाप गूंजे,जो अनमोल हो
मिलन बासुंरी में नयी धुन छिड़े,
नहीं अब विरह की कोई रीत हो
नये वर्ष पर कुछ......

नये छंद हों,कुछ नये रस बहे,
नये अर्थ कुछ,सर्ग-प्रत्यय नये 
नये रूपलंकार पर शोध हो
नये हर क़दम पर नयी जीत हो.
नये वर्ष पर कुछ .....

विगत वर्ष कुछ लिख गया,रह गया,
कोई बिन कहे कुछ,बहोत कह गया 
कोई पर्ण फिर टूट कर जुड़ गया
कोई बीच 'सागर' पृथक पड़ गया 
गयी बात छोड़ो,बढ़ो हाथ दो
चलो झूमकर नाच लें मीत हो
नये वर्ष पर कुछ......
आप सभी को नव वर्ष की हार्दिक शुभकानायें... 

Saturday, 26 November 2011

कविता बनकर उतरी तुम..... !!!

जब-जब अंतस की खाई में,
गुमसुम होकर तन्हा बैठा
जाने-अनजाने से मुझमे,
इक कविता बनकर उतरी तुम....


स्मृतियों के  हिमपातो में,
मैं विरह ताप में जब झुलसा 
मेरे सीने के गोमुख से,
इक  कविता बन कर उतरी तुम....


मेरी रेखाओं के विलोम,
मैं तेरा ही पर्याय रहा
तुम मोती बन अनमोल हुई,
मैं सीप वर्म असहाय रहा....


तेरे दरवाज़े से जब भी,
बिन दस्तक दिए चला आया
मेरे पावो के छालो में,
इक  कविता बन कर उतरी तुम...


तेरे ख्वाबो से विलग हुआ,
पतझड़ के बेबस पत्तो सा 
जीवन चौसर पर हार गया,
अर्जुन सा खड़ा निहत्थो सा...


जब किसी मंच पर प्रेम काव्य,
पढ़ते-पढ़ते ख़ामोश हुआ
श्रोता में बहकर अश्रुधार,
इक कविता बन कर उतरी तुम...


जब जेठ दुपहरी में शीतल 
इक मंद बयार बहा करती
जब-जब सावन की बूंदों में,
इक जलती अगन छुआ करती...

जब इन पथराई आखों में,
तृप्ति से बढ़ कर प्यास हुई,
जब-जब 'सागर' की बाँहों में 
धरती पिघली आकाश हुई...


घनघोर अमावस में जब-जब 
पूरनमासी का चाँद उगा 
मेरे खंडित उपवासों से 
इक  कविता बनकर उतरी तुम.....!!!