Saturday, 10 September 2011

और तुम ख़ामोश थी.......!

और तुम ख़ामोश थी..
मैं हमेशा की तरह ही बोलता था जा रहा
पूछता तुमसे कभी कुछ,और तुमको देखता 
और तुम ख़ामोश थी.....

दूब पर बिखरे हुए मोती हज़ारों ओस के 
मौन स्वीकृति दे रहे थे प्रेम को मानो हमारे
भोर की लाली खिलाती गुनगुनी सी रश्मियाँ सब, 
अर्घ पहला दे रही आलिंगनो को थी तुम्हारे
पक्षियों के पुंज चिंतित,चहकते सब पूछते थे 
आहलादित सुबह में,इस मौन का औचित्य क्या है?
प्रणय में यह वेदना क्यों.....?
और तुम ख़ामोश थी.....

गीत गाते झूमते जब सामने कुछ कृषक गुज़रे 
याद है तुमको हमें वो देख कर चुप हो गए थे,
और वो मृग युगल भी जो झील में था खेलता,
देख कर मानव युगल कुछ खिन्न जैसे हो रहे थे,
दरअसल हर रूप में थी,प्रकृति तुमसे पूछती 
प्रीति के संगीत में इस शांति का अभिप्राय क्या है?   
मिलन में व्यवधान क्यों.........?
और तुम ख़ामोश थी.....

दोपहर जब तप रहा था सूर्य चारों ओर से,
अंक में लेटी हुई तुम शांत सब सुनती रहीं  
चित्त भूला जा रहा था सहज जीवन मार्ग अपना,
और तुम चुपचाप लेटी,पथ नया चुनती रही,
और संशय छाँव में,मैं स्वयं से था पूछता 
प्रेम की भागीरथी में जब नही पावन हुए 
अग्नि फेरे और कुमकुम स्वांग का औचित्य क्या है?
व्यर्थ का यह योग क्यों........?
और तुम ख़ामोश थी.....

सायं की बेला निकट,सब पथिक घर को लौटते 
पक्षियों के झुण्ड,वापस घोसलों को उड़ चले
और तुमने मौन तोड़ा बोलकर दो शब्द यह-
"आज का यह दिवस अंतिम साथ अपने प्रेम का"
और पूरे दिवस की हर बात पर बस यह कहा-
"क्यों तुम्हारे प्रश्न का उत्तर भला मैं दूँ तुम्हे?"

और वह जो शाल ख़ामोशी की ओढ़े सुबह से 
मेरे कांधे पर ओढ़ा कर,और फिर तुम चल दिए 
और फिर तुम चल दिए,निस्वार्थ से निर्लिप्त से
और मैं तकता रहा निर्मूल सा,निष्प्राण सा 
और सहमी झील अपने पाश में थी सिमटती 
और दोनों हरिण रोते भागते थे हर तरफ़ 
और पथिको ने कभी वह रास्ता फिर न चुना 


और तब से आज तक वह पेड़ निष्फल ही रहा
और तब से दूब का तिनका नही उगता वहां 
उस दिवस की यंत्रणा पर प्रकृति का ऐसा रुदन !
और हम थे,रत्न "सागर" में सदा निर्धन रहे
प्रेम अमृत या गरल मैं आज तक समझा नही
प्रेम की प्रत्यक्ष परिणत बस यही दिखती मुझे-
"मंदिरों की घंटियों सी गूंजती हो आज तुम
मौलवी के हाथ की तस्बीह सा ख़ामोश मैं"


मौलवी के हाथ की तस्बीह सा......................











48 comments:

  1. सागर जी आपकी रचना सिर्फ रचना ही नही... भावनाओं का वह गहरा "सागर" है जिसकी गहराई तक पहुचने का साहस सिर्फ "सागर"यानि आप ही कर सकते है....

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  2. मासूम, प्यारा सा खूबसूरत प्यार का इज़हार.....

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  3. बहुत बढ़िया ...

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  4. और तुमने मौन तोड़ा बोलकर दो शब्द यह-
    "आज का यह दिवस अंतिम साथ अपने प्रेम का"
    और पूरे दिवस की हर बात पर बस यह कहा-
    "क्यों तुम्हारे प्रश्न का उत्तर भला मैं दूँ तुम्हे?"

    स्वार्थ ||

    दिल के टुकड़े हजार ||

    शानदार प्रस्तुति |

    बधाई सागर ||

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  5. गीत गाते झूमते जब सामने कुछ कृषक गुज़रे
    याद है तुमको हमें वो देख कर चुप हो गए थे,
    और वो मृग युगल भी जो झील में था खेलता,
    देख कर मानव युगल कुछ खिन्न जैसे हो रहे थे,
    दरअसल हर रूप में थी,प्रकृति तुमसे पूछती
    प्रीति के संगीत में इस शांति का अभिप्राय क्या है?
    मिलन में व्यवधान क्यों.........?
    और तुम ख़ामोश थी.....
    bahut khoob

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  6. खूबसूरत रचना , बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  7. भावों की बहुत ख़ूबसूरत अभिव्यक्ति..

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  8. दिल को छू गयी..सागर भाई ये रचना...बहुत ही सुन्दर.... संवेदनायें बोल रही है इस रचना में..

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  9. lajawab prastuti hai aur shbd sanyojan jabardast kamaal ka hai....doob gaye apke shabd chitran me.
    ek jabardast rachna.

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  10. सागर जी,आपने तो हमें खामोश ही कर दिया.क्या दृश्य,क्या भाव,क्या गहराई,शब्द चयन -एक चमत्कार.आदि और अंत का जो प्लॉट ढूँढ कर लाये हैं -सृजन वहीं से अंकुरित हुआ है.कई बार पढ़ गया,मन नहीं भरा.

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  11. बहुत सुन्दर भावों से ओत प्रोत रचना ...

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  12. उम्दा .. लाजवाब

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  13. बहुत सुन्दर और भावपूर्ण प्रस्तुति |
    आशा

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  14. कल 12/09/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  15. "मंदिरों की घंटियों सी गूंजती हो आज तुम
    मौलवी के हाथ की तस्बीह सा ख़ामोश मै
    कमाल का काव्य है....
    सादर बधाई...

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  16. बहुत सारे एहसासों को एक साथ पिरो दिया
    सुन्दर रचना के लिए बधाई

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  17. प्रेम की प्रत्यक्ष परिणत बस यही दिखती मुझे-
    "मंदिरों की घंटियों सी गूंजती हो आज तुम
    मौलवी के हाथ की तस्बीह सा ख़ामोश मैं"



    बहुत सुन्दर एवं मर्मस्पर्शी रचना ! हार्दिक शुभकामनायें !

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  18. sagar ji
    har bar ki tarah is baar bhi ek nai duniya me le gaye aur ant ne to khamosh kar diya.

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  19. "मंदिरों की घंटियों सी गूंजती हो आज तुम
    मौलवी के हाथ की तस्बीह सा ख़ामोश मैं "
    बहुत खूबसूरत.........

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  20. This comment has been removed by the author.

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  21. बेशक वह खामोश थी लेकिन उस ख़ामोशी को आपने बहुत सुंदर शब्दों में अभिव्यक्त किया ...आपका आभार

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  22. फेसबुक पर निवेदिता से दोस्ती यहाँ तक ले आई...ख़ामोशी के बोल , उसके भाव बेहद खूबसूरत लगे....

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  23. सुन्दरता से अभिव्यक्त किया है

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  24. बेहतर अभिव्यक्ति ...

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  25. aur tum khamosh thi.
    bhut sundr n mnbhavn.

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  26. आपको अग्रिम हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं. हमारी "मातृ भाषा" का दिन है तो आज से हम संकल्प करें की हम हमेशा इसकी मान रखेंगें...
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  27. एक-एक शब्द भावपूर्ण ...
    संवेदनाओं से भरी बहुत सुन्दर कविता.

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  28. दिल छु लेने वाली रचना.

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  29. बहुत खूब ... दिल में उतर गारी आपकी रचना सागर साहब ...

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  30. भावों की बहुत ख़ूबसूरत अभिव्यक्ति|

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  31. बहुत अच्छा लिखा ,
    बात कह रहे थे नैन जब , तब शब्दों का क्या स्थान होता ,
    व्यक्त कर रही थी बात धडकन ,फिर क्यों शब्दों से कुछ बयान होता
    एक इसी आस में शायद वो बैठी मौन थी

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  32. सागरजी आपका गीत अद्भुत है । लय शब्द भाव और प्रवाह--सबका संयोजन बहुत ही खूबसूरत है ।

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  33. सुंदर गीत....
    मंदिरों की घंटियों सी गूंजती हो आज तुम
    मौलवी के हाथ की तस्बीह सा ख़ामोश मैं"---क्या बात है

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  34. kamaal kar diya sir apne to.....maa kasam, jajbaat jaga diye

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  35. अद्भुत है आपका ये संयोजन,
    बधाई,
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  36. अगर आपकी उत्तम रचना, चर्चा में आ जाए |

    शुक्रवार का मंच जीत ले, मानस पर छा जाए ||


    तब भी क्या आनन्द बांटने, इधर नहीं आना है ?

    छोटी ख़ुशी मनाने आ, जो शीघ्र बड़ी पाना है ||

    चर्चा-मंच : 646

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  37. बहुत सुन्दर और भावपूर्ण प्रस्तुति |

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  38. भावनाओं का अद्भुत संगम है यह अभिव्‍यक्ति ...।

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  39. खूबसूरत कविता भाई सागर जी बधाई और शुभकामनाएं

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  40. बढ़िया रचना सागर जी | बधाई |
    मेरे ब्लॉग में भी आयें-

    **मेरी कविता**

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  41. प्रिय भाई आशीष अवस्थी 'सागर'जी
    सादर सस्नेहाभिवादन !

    आहाऽऽह ! बहुत भावप्रवण रचना है …
    सायं की बेला निकट,सब पथिक घर को लौटते
    पक्षियों के झुण्ड,वापस घोंसलों को उड़ चले
    और तुमने मौन तोड़ा बोलकर दो शब्द यह-
    "आज का यह दिवस अंतिम साथ अपने प्रेम का"
    और पूरे दिवस की हर बात पर बस यह कहा-
    "क्यों तुम्हारे प्रश्न का उत्तर भला मैं दूं तुम्हे?"


    अधिक न कह कर बस यही कहूंगा
    'सागर' !
    तू प्यार का सागर है … तेरी हर कविता के प्यासे हम !

    :)))))

    ♥ हार्दिक शुभकामनाएं !♥
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  42. बहुत ही सुन्दर.

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  43. wahh..
    dil ko chhu lenewali rachana
    bahut hi acchi kavita hai...

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  44. सागर जी...क्या खूब लिखा है आपने...लाजवाब....क्या नहीं है इस प्रेम काव्य में....एक ही क्षण में मिलन है,विरह है...सबकुछ....बहुत ही सुंदरता से और बहुत ही सुंदर तरीके से काव्य सृजन किया है आपने....शूभकामनाएं...बधाईयाँ।

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  45. lagbhag meri jindagi ka haqiqat hai... kavita sach mein achhi hai... bas iska length mujhe jyada laga...

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  46. nice work great,
    welocme to my blog www.utkarsh-meyar.blogspot.com

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