Saturday, 27 August 2011

कई दफ़े सोचता हूँ..!

कई दफ़े सोचता हूँ कि तुम कहाँ हो?
कि इस आंगन में पाँयजेबर की कोई खनक ही नही
कि सामने मेहंदी के पेड़ की एक पत्ती भी तो न टूटी
कि कुआं तो अब भी प्यासा हैं रस्सी की इक छुअन के लिये
कि उस तार पर भीगी कोई चुनरी नही सूखी अब तक
कि माँ के हथफूल अब तक कपड़े में लिपटे रखे
कि घर के दरवाजे पे कोई झालर नही टंगी अब तक
बहोत दफ़े सोचता हूँ कि तुम कहाँ हो?
कि सुबह की चाय अब तक दफ़्तर में ही पीता हूँ मैं
कि शाम अब तक मेरी होती हैं गंगा की रेत पर लिखते
बहोत दफ़े सोचता हूँ-
कि तुम थी भी,
या सिर्फ़ शब्दों का हेर-फेर था?
अहसासों का था तिनका कोई
या फिर सिर्फ़ विचारो की अदला-बदली?
ग़र नही थी,
तो फिर क्यों मैं ग़ज़ल पढ़ने से डरता अब तक?
क्यों उलझी रहती हैं 
रात की चादर की बेतरतीब सिलवटें?
क्यों सुबह का सूरज मेरी आखों में उगता पहले?
सब कहते हैं-यहाँ कोई तो नही
 फिर मैं किससे कहता हूँ-
"दो पल रुको तो, फिर चली जाना" 
ये सच हैं कि क़दमो के निशां
सिर्फ़ एक के दिखते सबको
पर कोई हैं,
 जो क़दम-दर-क़दम मेरे साथ-साथ चलता हैं...
सांस-दर-सांस मेरे सीने में सुलगता हैं....
लफ्ज़ -दर-लफ्ज़ मेरी नज़्म में उतरता हैं.....
कई दफ़े सोचता हूँ कि तुम कहाँ हो?




30 comments:

  1. बहुत खूब सागर जी....एहसासों और शब्दों को बहुत ही खूबसूरती से एक रचना पिरोया है आपने....हर एक पंक्ति अपने आप में एक रचना रचती है...

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  2. खूबसूरती से लिखे एहसास ...अच्छी प्रस्तुति

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  3. ये सच हैं कि कदमो के निशां
    सिर्फ़ एक के दिखते सबको
    पर कोई हैं,
    जो कदम-दर-कदम मेरे साथ चलता हैं...
    सांस-दर-सांस मेरे सीने में सुलगता हैं....
    लफ्ज़ -दर-लफ्ज़ मेरी नज़्म में उतरता हैं.....
    बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति सागर जी.ह्रदय के भाव शब्दों में बहुत ही खूबसूरती से उतारे हैं आपने.
    पहेली संख्या -४२

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  4. ये सच हैं कि कदमो के निशां
    सिर्फ़ एक के दिखते सबको
    पर कोई हैं,
    जो कदम-दर-कदम मेरे साथ-साथ चलता हैं...
    सांस-दर-सांस मेरे सीने में सुलगता हैं....
    लफ्ज़ -दर-लफ्ज़ मेरी नज़्म में उतरता हैं.....dil ke ehsaas

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  5. बहुत बढ़िया सर।
    ------
    कल 29/08/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  6. बहुत बढ़िया. ..बहुत खूब ..

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  7. सुन्दर रचना , सुन्दर भावाभिव्यक्ति

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  8. बहुत सुन्दर रचना , सुन्दर अभिव्यक्ति....

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  9. bahut sunder.... sath ke pics ne jaan dal di...

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  10. बहुत सुन्दर मार्मिक, भावपूर्ण रचना....

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  11. ये सच हैं कि कदमो के निशां
    सिर्फ़ एक के दिखते सबको
    पर कोई हैं,
    जो कदम-दर-कदम मेरे साथ-साथ चलता हैं...
    सांस-दर-सांस मेरे सीने में सुलगता हैं....
    लफ्ज़ -दर-लफ्ज़ मेरी नज़्म में उतरता हैं...
    बहुत सुन्दर एहसास....

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  12. कई दफ़े सोचता हूँ कि तुम कहाँ हो?

    सरल सहज भावनाए मन को छू लेती है.

    यदि मीडिया और ब्लॉग जगत में अन्ना हजारे के समाचारों की एकरसता से ऊब गए हों तो कृपया मन को झकझोरने वाले मौलिक, विचारोत्तेजक आलेख हेतु पढ़ें
    अन्ना हजारे के बहाने ...... आत्म मंथन http://no-bharat-ratna-to-sachin.blogspot.com/

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  13. अहसासों का था तिनका कोई
    या फिर सिर्फ़ विचारो की अदला-बदली?

    सागर की असीम गहराई में कितने बेशकीमती मोती छुपे हैं यह सागर को भी नहीं पता होता.सागर-मंथन करते रहें और ऐसे ही रत्न-जवाहरात से हमें मालामाल करते रहें.उत्कृष्ट रचना हेतु आभार.

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  14. कुआं तो अब भी प्यासा हैं रस्सी की इक छुअन के लिये...

    अद्भुत! ..... बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.

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  15. हर एक पहरा जबरदस्त एह्सासों की दुहाई दे रहा है.....इतनी शिद्द्त से भी कोइ महसूस कर सकता है किसी को ये इसे पढ कर जाना.

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  16. अच्छी प्रस्तुति ...........

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  17. बहुत खूब ... सोच की उड़ान कहाँ कहाँ तक ले गयी ...
    इसी सोच से निकली कविता भी लाजवाब है ...

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  18. बेहद खूबसूरत....
    पहली बार हूं आपके ब्लॉग पर...अच्छा लगा..

    अपने ब्लाग् को जोड़े यहां से 1 ब्लॉग सबका

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  19. आपके ब्लॉग पर पहली बार आना हुआ |सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति
    आशा

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  20. बहुत ख़ूबसूरत रचना

    अकथनीय

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  21. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

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  22. Beautifully crafted Sagar...nice work..

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  23. ohh bahaut hi khubsurat likah hai.... aapki ek-ek saans....kisi ke liye sulagti hai...hr lafz kisi ko pukarta hai...apke hr kadam kisi ke nishanon pr chalte hain....

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  24. This comment has been removed by the author.

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  25. तुझमे ही तो बस गयीं हूँ तेरा साया बन कर

    अपनी बात कहती हूँ सदा तेरे शब्द बन कर

    जानती हूँ इस मृगमारीचिका का कही कोई अंत नही

    महसूस करके देखो , बसी तो हूँ तेरी खुशबू बन कर

    करती भी क्या जब जहाँ ने ऐतराज किया, रहूँ संग तेरी बनकर

    तुम भी तो ना थे हौसले कर पाये , चलते मेरा हाथ थामकर

    मगर जुदा रह नही सकते थे हम,मृत्यू की पनाह में भी जा कर

    तो बस गयी सदा के लिये तेरे जिस्म में तेरी हमदम बन कर

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