Tuesday, 2 August 2011

रमज़ान मुबारक

अल्लाह को याद कर लो, फिर रमज़ान आ गया
नीयत को पाक कर लो, फिर रमज़ान आ गया 

ख़ुश्बू-ए-तरावीह में, हर सख्श सराबोर
आग़ाज़-ए-हयात कर लो, फिर रमज़ान आ गया 

दुनिया से ख़त्म हो सके, माहौल-ए-क़ज़ा अब
इन्सां की क़द्र कर लो, फिर रमज़ान आ गया 

फरमा रहे रसूल, तुम ख़ाना-ए-दिल में अब
जज़्बे-मुहब्बत भर लो, फिर रमज़ान आ गया 

खुशकिस्मतों को मिलते हैं, लम्हें नमाज़ के
इबादत बुलन्द कर लो, फिर रमज़ान आ गया 

शिकवा-शिकायतों का बहर, दरकिनार कर
हम सब गले लगें, तो  फिर रमज़ान आ गया ................. 

20 comments:

  1. Humare Sabhi deshwasiyon ko ramzaan pak bahut bahut mubark ho........................

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  2. बेहद खुबसुरत नज्म। रमजान मुबारक।

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  3. पादरी, मौलवी, पंडितों का वहम
    गाड, अल्लाह, भगवान् में फर्क क्या .
    सर्वधर्म समभाव को प्रस्तुत करती बहुत सुन्दर रचना. आभार

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  4. बहुत बढ़िया अभिव्यक्ति सागर जी, मुबारक

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  5. आपको भी रमजान मुबारक..

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  6. आज 03- 08 - 2011 को आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है .....


    ...आज के कुछ खास चिट्ठे ...आपकी नज़र .तेताला पर
    ____________________________________

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  7. सुन्दर भावों से सजा सुन्दर गज़ल......

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  8. खुशकिस्मतों को मिलते हैं, लम्हें नमाज़ के
    इबादत बुलन्द कर लो, फिर रमज़ान आ गया ... bahut badhiyaa

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  9. बेहद खुबसुरत नज्म। रमजान मुबारक।

    लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/
    अगर आपको love everbody का यह प्रयास पसंद आया हो, तो कृपया फॉलोअर बन कर हमारा उत्साह अवश्य बढ़ाएँ।

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  10. बहुत सुंदर पंक्तियाँ..... शुभकामनायें सभी को

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  11. बेहद खूबसूरत गजल. आभार...
    सादर,
    डोरोथी.

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  12. sagar sahib,

    behtareen peshkah!

    har ek sher laajawab.....

    ramjaan mubarak...

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  13. प्रिय बंधुवर आशीष अवस्थी 'सागर'जी
    सस्नेहाभिवादन !


    अन्य धर्मावलंबियों की आस्था का सम्मान हमारी स्वस्थ सनातन परंपरा का हिस्सा है ।

    जैसे आपने संकीर्ण मानसिकता त्याग कर रमज़ान मुबारक संबंधी रचना लिखी , मुस्लिम भाई-बहन नवरात्रि पर्व , कृष्ण जन्माष्टमी पर लिख कर सौहार्द और दूसरे धर्मावलंबियों की भावना को आदर दे तो भाईचारे और विश्वास का माहौल बनने में मदद मिले …

    अल्लाह को याद कर लो, फिर रमज़ान आ गया
    नीयत को पाक कर लो, फिर रमज़ान आ गया

    दुनिया से ख़त्म हो सके, माहौल-ए-क़ज़ा अब
    इन्सां की क़द्र कर लो, फिर रमज़ान आ गया


    अच्छा लिखा है आपने मैंने भी लिखी है ऐसी रचनाएं …
    भुलादे रंज़िशो - नफ़रत , अभी रमज़ान के दिन हैं !
    तू कर अल्लाह से उल्फ़त , अभी रमज़ान के दिन हैं !


    पूरी रचना के लिए मेरे ब्लॉग पर पधारें …

    हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !
    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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  14. अल्लाह को याद कर लो, फिर रमज़ान आ गया
    नीयत को पाक कर लो, फिर रमज़ान आ गया
    xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx
    खुशकिस्मतों को मिलते हैं, लम्हें नमाज़ के
    इबादत बुलन्द कर लो, फिर रमज़ान आ गया

    पूरी रचना मानवता और समन्वय के भावों से ओतप्रोत है ....आपका आभार

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  15. भाई सागर जी सुंदर गज़ल बधाई

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  16. सागर जी..आपकी मुबारकबाद हम तक पहुँच गयी.. शुक्रिया..

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  17. शिकवा-शिकायतों का बहर, दरकिनार कर
    हम सब गले लगें, तो फिर रमज़ान आ गया ...
    jahan khushiyaan hai wahi tyohaar ,aesa ho jaaye to phir kaya ,bahut hi achchha likha hai

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  18. दुनिया से ख़त्म हो सके, माहौल-ए-क़ज़ा अब
    इन्सां की क़द्र कर लो, फिर रमज़ान आ गया ...

    आपकी ग़ज़ल पढ़ कर मज़ा आ गया ... सभी को रमजान मुबारक ....

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