Monday, 25 July 2011

इक महल था जो खंडहर देखा...!!!



बाद मुद्दत के अपना घर देखा 
इक महल था,जो खंडहर देखा

ढूँढने पर भी न मिला कोई लौटने का निशाँ
सिर्फ़ रुख़सत को बना था,वो रहगुज़र देखा

मुफ़लिसी में भी जिसे भूखा न रखा माँ ने 
कुँए के पास ख़ामोश गड़ा था,वो पत्थर देखा

जो बन सका न हमारे इश्क़ की सलामती का सबब 
पीर बाबा की मज़ार का वो जंतर देखा

नाम-ए- महबूब पर मिटते हुए आशिक़ देखे
दिल की दुनिया को लूटता भी हमसफ़र देखा

किसके आग़ोश में आख़िर कोई महफूज़ रहे 
कारवां लूटते हाफिज़ को ही अक्सर देखा

बहुत सुना था वहां कोई गहरा सा "सागर" बहता 
गया,तो प्यास से मरता हुआ पोखर देखा



36 comments:

  1. behtreen gajal,, kamal kar diya....
    jai hind jai bharat

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  2. किसके आग़ोश में आखिर कोई महफूज़ रहे
    कारवां लूटते हाफिज़ को ही अक्सर देखा.!

    बहुत बढ़िया गजल रची है आपने।

    सादर

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  3. मुफ़लिसी में भी जिसे भूखा न रखा माँ ने
    कुँए के पास ख़ामोश गड़ा था वो पत्थर देखा.!

    बेहतरीन गजल

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  4. बेहतरीन गजल ...

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  5. कल 27/07/2011 को आपकी एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  6. बहुत ही सुन्दर गज़ल ..सार्थक भाव के साथ ..बधाई..

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  7. बहुत बहुत बधाई ||

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  8. जो बन सका न हमारे इश्क़ की सलामती का सबब
    पीर बाबा की मज़ार का वो जंतर देखा
    ...बहुत खूबसूरत गज़ल!

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  9. किसके आग़ोश में आख़िर कोई महफूज़ रहे
    कारवां लूटते हाफिज़ को ही अक्सर देखा ...

    बहुत खूब ... लाजवाब शेर है ... हकीकत बयान कर दी है आपने ..

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  10. मुफ़लिसी में भी जिसे भूखा न रखा माँ ने
    कुँए के पास ख़ामोश गड़ा था,वो पत्थर देखा

    बहुत सुंदर...

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  11. बहुत ही खूबसूरत रचना आज पहली बार आई पर दिल बहुत खुश हुआ बहुत सुन्दर रचना दोस्त जी :)

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  12. अच्छी ग़ज़ल!

    भाई आपके प्रोफ़ाइल में ई-मेल आई.डी. नहीं है। हम आंच पर आपकी रचना लेना चाहते हैं, जिसकी सूचना मेल से नहीं दे पा रहे हैं। क्या आप अपना मेल आई.डी. प्रेषित करेंगे।

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  13. खूबसूरत गजल.आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  14. बढ़िया प्रस्तुति
    बधाई

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  15. पीर बाबा की मज़ार का वो जंतर देखा
    ...बहुत खूबसूरत गज़ल! ....सागर जी

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  16. .




    प्रियवर सागर जी
    सस्नेह … !

    आपकी इस पोस्ट को पहले भी पढ़ कर गया था , पता नहीं कमेंट लिखना रह गया था या पब्लिश नहीं हुआ …

    बहुत सुना था वहां कोई गहरा सा "सागर" बहता
    गया,तो प्यास से मरता हुआ पोखर देखा


    पूरी रचना अच्छी लगी …

    हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !

    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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  17. Dost....beautifully crafted......

    A gr888 piece of art :)

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  18. महा-स्वयंवर रचनाओं का, सजा है चर्चा-मंच |
    नेह-निमंत्रण प्रियवर आओ, कर लेखों को टंच ||

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  19. बहुत सुना था वहां कोई गहरा सा "सागर" बहता
    गया,तो प्यास से मरता हुआ पोखर देखा
    Bahut bemisaal gzal...

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  20. बढ़िया प्रस्तुति
    आपको मेरी हार्दिक शुभकामनायें
    आप का बलाँग मूझे पढ कर अच्छा लगा , मैं भी एक बलाँग खोली हू
    लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/
    अगर आपको love everbody का यह प्रयास पसंद आया हो, तो कृपया फॉलोअर बन कर हमारा उत्साह अवश्य बढ़ाएँ।

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  21. बेहतरीन गजल ........

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  22. ढूँढने पर भी न मिला कोई लौटने का निशाँ
    सिर्फ़ रुख़सत को बना था,वो रहगुज़र देखा
    waah

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  23. बहुत सुना था वहां कोई गहरा सा "सागर" बहता
    गया,तो प्यास से मरता हुआ पोखर देखा

    मन को उद्वेलित करने वाली गजल.... आपको मेरी हार्दिक शुभकामनायें.

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  24. बहुत भावपूर्ण रचना |बधाई
    आशा

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  25. भाई सागर जी बहुत सुंदर गज़ल बधाई और शुभकामनायें |

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  26. मुफ़लिसी में भी जिसे भूखा न रखा माँ ने
    कुँए के पास ख़ामोश गड़ा था,वो पत्थर देखा

    किसके आग़ोश में आख़िर कोई महफूज़ रहे
    कारवां लूटते हाफिज़ को ही अक्सर देखा ...
    बहुत बढ़िया गज़ल बधाई

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  27. बढ़िया प्रस्तुति.

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  28. मुफ़लिसी में भी जिसे भूखा न रखा माँ ने
    कुँए के पास ख़ामोश गड़ा था,वो पत्थर देखा...bahut sundar panktiyan...mere blog pe aane aur hausla afjayee ke liye hardik dhnyawad

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  29. बहुत सुना था वहां कोई गहरा सा "सागर" बहता
    गया,तो प्यास से मरता हुआ पोखर देखा
    भावपूर्ण प्रस्तुति!

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  30. aap sabhi ka bht bht aabhar !! saadar!!

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  31. बाद मुद्दत के अपना घर देखा
    इक महल था,जो खंडहर देखा

    ढूँढने पर भी न मिला कोई लौटने का निशाँ
    सिर्फ़ रुख़सत को बना था,वो रहगुज़र देखा

    मुफ़लिसी में भी जिसे भूखा न रखा माँ ने
    कुँए के पास ख़ामोश गड़ा था,वो पत्थर देखा

    जो बन सका न हमारे इश्क़ की सलामती का सबब
    पीर बाबा की मज़ार का वो जंतर देखा
    hame aapki rachna behad pasand aai ,comment to ek baar hai magar padhkar kai dafe jaa rahi hoon .kamaal ka likhte hai aap .sagar ki gahrai ,khamoshi ,ufaan aur halchal sabhi kuchh maujad hai yahan to ,gotakhor banna hi padega mujhe doobne ke liye .

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